हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हबीबुल्लाह फरहज़ाद ने हरम-ए-हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.ल.) में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इमाम हसन अस्करी (अ.स.) की विलादत की मुबारकबाद दी। उन्होंने कहा कि इमाम हसन अस्करी (अ.स.) के फ़रमान के अनुसार अल्लाह पर ईमान और अल्लाह के बंदों को लाभ पहुंचाना इंसान की सर्वोच्च खूबियों में शामिल है।
उन्होंने कहा कि अल्लाह पर दिल से विश्वास रखना और उसे हर हाल में हाज़िर व नाज़िर समझना ही ईमान है। इस्लाम और ईमान में अंतर है। इंसान अपनी ज़बान से अल्लाह की वहदानियत और पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) की नुबूवत को स्वीकार करके मुसलमान हो जाता है, लेकिन जब यह विश्वास उसके दिल में उतर जाता है, तब वास्तविक ईमान पैदा होता है।
उन्होंने आगे कहा कि जो व्यक्ति अल्लाह को वास्तविक रिज़्क़ देने वाला मानता है, उसे रोज़ी के बारे में अत्यधिक चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि अल्लाह के आदेशों का पालन करना चाहिए। क्योंकि अल्लाह बेहतर जानता है कि अपने बंदे तक रोज़ी किस माध्यम से पहुंचानी है।
हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन फरहज़ाद ने ईमान को मजबूत बनाने के लिए पवित्र स्थलों, औलिया-ए-खुदा और मोमिनों की ज़ियारत व संगत को प्रभावी बताया। उन्होंने कहा कि रिवायतों में एक मोमिन के साथ बैठने और उसकी संगत को एक साल की इबादत से भी अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है।
उन्होंने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.ल.) के फ़रमान के अनुसार सर्वोच्च ईमान यह है कि इंसान को विश्वास हो कि अल्लाह हर हाल में उसके साथ है।
हरम-ए-हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.ल.) के ख़तीब ने इमाम हसन अस्करी (अ.ल.) की दूसरी महत्वपूर्ण शिक्षा की ओर इशारा करते हुए कहा कि इंसान को केवल अपने बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि दूसरों के लिए लाभकारी बनना चाहिए। जो लोग दूसरों की परेशानियां दूर करते हैं और उन्हें लाभ पहुंचाते हैं, वे अल्लाह के अधिक क़रीब होते हैं।
उन्होंने कहा कि कुछ व्यापारी लोगों की सेवा और उन्हें लाभ पहुंचाने को अपना उद्देश्य बनाते हैं और ऐसे लोग अल्लाह के पसंदीदा बंदों में शामिल होते हैं, जबकि केवल लोगों की जेब खाली करने की चिंता करना सही रवैया नहीं है।
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